जिला मुख्यालय से सिर्फ़ ६ किलोमीटर दखिण पूरब रऊप गावं की पहाड़ी पर पञ्च मुखी महादेव की अति प्राचीन मूर्ति स्थापित है । पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई का कार्य कराने की बात चल रही है । इस स्थान पर अन्य तमाम दुर्लभ मुर्तिया मिली हैं । इस स्थल पर महाशिवरात्रि व् बसंत पंचमी के अवसर पर मेले का आयोजन होता है।
शुक्रवार, 10 जुलाई 2009
पञ्चमुखी महादेव
जिला मुख्यालय से सिर्फ़ ६ किलोमीटर दखिण पूरब रऊप गावं की पहाड़ी पर पञ्च मुखी महादेव की अति प्राचीन मूर्ति स्थापित है । पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई का कार्य कराने की बात चल रही है । इस स्थान पर अन्य तमाम दुर्लभ मुर्तिया मिली हैं । इस स्थल पर महाशिवरात्रि व् बसंत पंचमी के अवसर पर मेले का आयोजन होता है।
दूधेश्वर महादेव
गिरिजाशंकर महादेव कंडा कोट
जिला मुख्यालय से ८ किमी पक्षिम उची चोटी पर स्थित लगभग ३०० वर्ष पुरानें मन्दिर में गिरिजाशंकर महादेव की मूर्ति स्थापित है । इस मूर्ति को देखने से लगता है की यह कभी अघोर साधक रहते रहें होगें । यहाँ हर साल वसंत पंचमी ,शिवरात्री व् आषाढ़ शुक्लपक्ष को मेला लगता है । पहाड़ के नीचे से मन्दिर तक पहुचनें के लिए सदर ब्लाक प्रमुख कमलाकांत पाण्डेय व् उनके सहयोगियों द्वारा सीढ़ी का निरमाण कराया गया है । लोगो की मान्यता है की यहाँ सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ।गुप्तेश्वर महादेव

जिला मुख्यालय से ७० किमी दक्षिण पूर्व के कोने पर सोननदी के किनारे गुप्तेश्वर महादेव एक गुफा में स्थित हैं । कोन बाजार से ७ किमी चांची गाँव से सोननदी पार कर यहाँ तक पहुंचा जा सकता है । नदी के ठीक किनारे स्थित पहाड़ की ऊँची चोटी पर एक गुफा में लगभग १५० मीटर अन्दर जाने पर प्राकृतिक रूप से बना शिवलिंग है । गुफा का आकार काफी विशाल है । उसका सम्बन्ध लोग विजयगढ़ दुर्ग व चुनार दुर्ग से भी बताते हैं । गुफा में २०० मीटर के आगे आज तक कोई नहीं जा पाया है । इस स्थान पर एम् एल सी जयप्रकाश चतुर्वेदी द्वारा एक यात्री सेड का तथा गुफा तक पहुँचने के लिए सीढ़ी का निर्माण कराया गया है । इस गुफा का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है । यहाँ बसंत पंचमी व शिवरात्री के अवसर पर मेले का आयोजन होता है । इसमे बिहार व झारखंड के हजारों लोग शामिल होते हैं ।
रविवार, 5 जुलाई 2009
सहश्रमुखी शिवलिंग

जिला मुख्यालय से २० किमी पूरब व् दक्षिण के कोने पर मऊ गावं में एक नाले के किनारे सहश्रमुखी शिवलिंग स्थित है । यह शिवलिंग किस शताब्दी का है इसका सही पता नहीं । कुछ लोग सिर्फ़ अनुमान के आधार पर इसके काल का जिक्र किए है । मऊ के आस पास सैकड़ों अन्य दूसरी देवी देवताओं की मुर्तिया विखरी पड़ी है । यहाँ से मात्र ३ किमी आगे चन्द्रकान्ता का तिलस्मी विजयगढ़ दुर्ग है । सहश्रमुखी शिवलिंग से थोडी दुरी पर एक अन्य शिवलिंग स्थापित है वही एक दुर्लभ नंदी की प्रतिमा है । मऊ गाँव में लाखो की लागत से संग्रहालय भवन का निर्माण सरकार द्वारा कराया गया है लेकिन वह अभी इस रूप में नही है की उसने दुर्लभ व प्राचीन मूर्तियाँ रखी जा सकें । मऊ गाँव पुरी तरह पर्यटकों के लिए अच्छा स्थान है । गाँव के बगल में विशाल धन्धरौल बाँध है । सहश्रमुखी शिवलिंग के आस पास प्रतिवर्ष मेले का आयोजन होता है । इसमे भारी संख्या में आदिवासी शामिल होते है ।
शनिवार, 4 जुलाई 2009
नालेश्वर महादेव

जिला मुख्यालय के लगभग ३० किमी पूरब कर्मनासा नदी के तट पर नालेश्वर महादेव का मन्दिर स्थापित हैं । इसमे काफ़ी बड़ा शिवलिंग हैं । जनश्रुति है की इस मन्दिर का सम्बन्ध राजा नल से है .राजा नल के द्वारा ही इस मन्दिर में मौजूद शिवलिंग की स्थापना की बात की जाती है। प्रतिवर्ष बसंत पंचमी व् शिवरात्री के अवसर पर यहाँ मेले का आयोजन किया जाता है । पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान यहाँ काफी प्राचीन वस्तुए मिली हैं। बिहार ,झारखण्ड समेत अन्य स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मेले में शरीक होते हैं । धार्मिक व् पुरातात्त्विक दोनों स्तरों पर इस स्थान का काफी महत्व है। इस स्थल से प्राकृतिक नजारे का भी आनन्द लिया जा सकता है । इस स्थान को नक्सल प्रभावित नगवां क्षेत्र के प्रमुख स्थल के रूप में विकसित करनें की मागं अरशे से की जा रही है ।
शुक्रवार, 12 जून 2009
धार्मिक स्थल

सोनभद्र में पुरातात्त्विक महत्त्व के तमाम स्थल मौजूद हैं । इसे द्वितीय काशी व् गुप्त काशीके नाम से भी जाता है ।शिवद्वार में उमा माहेश्वर
की दुर्लभ प्रतिमा कंडा कोट, गौरी शंकर ,बरेला,नल राजा ,गोठानी ,गुप्तेश्वर ,दुधवा ,शिवाल्ला गाँव ,मडरा ,एवं रेनुकूट मैं रेनुकेश्वर महादेव का प्रषिद मन्दिर है । इसी तरह शक्तिनगर मै ज्वालामुखी ,कुडारी ,अमिलाधाम ,भवानी गाँव ,मऊ ,समेत कुछ अन्य गाँव मैं शक्तिपीठ के रूप मैं कई देवी मन्दिर मौजूद हैं । इसके अलांवा कुछ अन्य देवी देवताओं की मूर्तियाँ इस जिले के गाँव मैं बिखरी हुई हैं । वहीँ आदिवासी बहुल इलाका होने से यहाँ तमाम जनजातियों के अपने कुल देवी देवता पूजे जाते है । डीह बाबा ,राजा लखन ,मुआ ,मरी समेत तमाम इस तरह के देवी देवता है जो उनके द्वारा पूजे जा रहे है ।
सोनभद्र एक परिचय
जनपद सोनभद्र का श्रीजन चार मार्च १९८९ को तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वारा किया गया । यह जनपद बिहार, झारखण्ड ,छतीस गढ़ , व् मद्यप्रदेश की सीमा से सटा हुआ है । इस जिले में एन .टी .पी.सी, के बीजपुर ,शक्तिनगर में दो विजली घर है । इसके अलावा अनपरा व ओबरा में राज्य सरकार के दो विजली घर हैं । पिपरी व ओबरा में दो पन विजली घर हैं । दुनिया की सबसे बड़ी एलुमिनियम फैक्ट्री हिंडाल्को ,रेणुकूट में स्थापित है । कनोरिया केमिकल्स व कार्बन के कारखाने भी वहा मौजूद हैं। एन .सी .एल की चार कोयला की खुली खदाने हैं । डाला में जेपी की सीमेंट फैक्ट्री तथा ३०० के आस पास क्रसर प्लांट हैं तथा लगभग १००० पत्थर की खदाने हैं । रेनू ,कनहर सोन,विजुल नदियो से व्यापक रूप से बालू की निकासी होती है । इसके अलावा फारेस्ट विभाग भी राजस्व की वसूली करता है । आर्थिक रूप से यह जिला काफी समृद्ध होने के साथ अपने आप में काफी रहस्य व रोमांच समेटे हुए है । चन्र्दकांता की कहानी यहीं के विजयगढ़ किले से सुरु होती है । अगोरी दुर्गे दुराचारी राजा मोलागत के पराभव की कहानी कह रहा है । शिवद्वार , बरेला , गोठानी के शिव मन्दिर के अलावा दर्जन भर शक्ति पीठ जंगलो में मौजूद हैं । इसके अलावा यहाँ पग पग पर तमाम किस्से व कहानिया भरी हैं ।
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